बिहार में पटना से क़रीब 90 किलोमीटर दूर नालंदा के खंडहर आज भी लोगों को हैरान करते हैं। ईंटों की ये दीवारें कभी दुनिया के सबसे बड़े शिक्षा केंद्रों में से एक का हिस्सा थीं।
नालंदा की शुरुआत
माना जाता है कि नालंदा महाविहार की स्थापना पाँचवीं सदी में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के समय हुई। बाद के राजाओं ने भी इसे दान और संरक्षण दिया, जिससे यह कई सदियों तक फलता-फूलता रहा।
यहाँ क्या पढ़ाया जाता था
यहाँ बौद्ध दर्शन के साथ-साथ तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, गणित और खगोल जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। भारत ही नहीं, चीन, कोरिया, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया से भी विद्यार्थी यहाँ आते थे।
चीनी यात्रियों की गवाही
सातवीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग (श्वेन त्सांग) यहाँ आए और कई साल रहकर पढ़ाई की। उनके और बाद में यिजिंग के विवरणों से हमें नालंदा के बारे में सबसे ज़्यादा जानकारी मिलती है। उनके अनुसार यहाँ हज़ारों विद्यार्थी और सैकड़ों शिक्षक थे। इन संख्याओं पर इतिहासकारों में थोड़ा मतभेद है, पर इतना तय है कि यह बहुत बड़ा केंद्र था।
विशाल पुस्तकालय
तिब्बती परंपरा में नालंदा के पुस्तकालय का ज़िक्र मिलता है, जिसमें लाखों पांडुलिपियाँ बताई जाती हैं। असल संख्या पर निश्चित प्रमाण कम हैं, इसलिए इन्हें परंपरा के रूप में ही देखना ठीक रहेगा।
अंत कैसे हुआ
बारहवीं सदी के आख़िर में, लगभग 1190 के दशक में, बख़्तियार ख़िलजी के हमले में नालंदा को भारी नुक़सान पहुँचा और इसके बाद यह धीरे-धीरे उजड़ गया। इसकी सटीक तारीख़ और कारणों पर इतिहासकार अलग-अलग राय रखते हैं।
आज का नालंदा
साल 2016 में नालंदा के खंडहरों को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। पास ही राजगीर में नया नालंदा विश्वविद्यालय भी शुरू किया गया है, जो पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
नालंदा हमें याद दिलाता है कि भारत में ज्ञान की परंपरा कितनी पुरानी और खुली रही है।